18 Jun, 2009

उस विद्यालय के बंद हो जाने में ही देश का भला है


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मैं नहीं चाहता कि राष्ट्रीय विद्यालयों में पढ़ाई-लिखाई बन्द करके कातना-पीजना ही सिखाया जाय या कराया जाय। मैं चाहता हूं कि विद्यार्थियों को काफी और उचित अक्षर-ज्ञान दिया जाय। मैं चाहता हूं कि वे पढ़ने-लिखने में सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों की बराबरी कर सकें।

मगर मुझे केवल अक्षर-ज्ञान से ही संतोष नहीं हो सकता। सरकारी स्कूलों में नौकरी का, मुंशीगिरी का उद्देश्य सामने रखकर केवल पढ़ना-लिखना ही सिखाया जाता है। राष्ट्रीय विद्यालयों का हेतु स्वराज्य, आजादी, स्वावलंबन है। इसलिए विद्यार्थियों को अक्षर-ज्ञान के साथ-साथ हृदय-बल और शरीर-श्रम की शिक्षा देनी चाहिए।


राष्ट्रीय स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई को साध्य समझने के बजाय उसे चरित्र बल बढ़ाने का और स्वराज्य के काम का साधन मानना चाहिए। दिल को मजबूत बनाने के लिए हृदय-बल वाले शिक्षक चाहिए। चर्खा स्वराज्य लेने का एक शक्तिशाली साधन होने के कारण, जिस राष्ट्रीय विद्यालय में चर्खे का आदर न हो, उसे मैं राष्ट्रीय हरगिज न कहूंगा।

जिस राष्ट्रीय विद्यालय में हिंदी, उर्दू सिखाना अनिवार्य न हो उससे राष्ट्र को शक्ति नहीं मिल सकती। जो राष्ट्रीय विद्यालय अछूतों का बहिष्कार करे, उस विद्यालय के बंद हो जाने में ही देश का भला है।


राष्ट्रीय विद्यालय में हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई, सभी जातियों के विद्यार्थियों को सगे भाइयों की तरह पढ़ना चाहिए। मेरे विचार से ये सारी बातें राष्ट्रीय होने के प्रतीक हैं ।
...... महात्मा गाँधी



नवजीवन 21-12-1924


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16 Jun, 2009

इसमें किसी प्रकार की साम्प्रदायिकता नहीं

धार्मिक शिक्षा को भी विषयों की शिक्षा के बराबर ही महत्त्व देना पड़ेगा। यह सच है कि धार्मिक पुस्तकों के ज्ञान की तुलना धर्म से नहीं की जा सकती। लेकिन हमें यदि धर्म नहीं मिल सकता तो हमें अपने लड़कों को उससे घटकर दूसरी वस्तु देकर ही सन्तोष करना पडे़गा।



स्कूलों में ऐसी शिक्षा दी जाये या न दी जाये किन्तु वयस्क लड़कों को अन्य विषयों की तरह धार्मिक विषय में भी स्वावलम्बन की आदत डालनी पड़ेगी। जिस प्रकार आज उनकी वाद-विवाद या चर्चा-समितियां हैं उसी प्रकार वे स्वयं ही धार्मिक वर्ग खोलें।


शिमोगा के कालेजियट हाई स्कूल के लड़कों के समक्ष भाषण करते समय पूछने पर मुझे पता चला कि लगभग सौ हिन्दू लड़कों में मुश्किल से आठ ने भगवदगीता पढ़ी थी। यह पूछने पर कि उनमें से कोई गीता का अर्थ भी समझता है, एक भी हाथ नहीं उठा। पांच-छ: मुसलमान विद्यार्थियों में से एक-एक ने कुरान पढ़ी थी, मगर अर्थ समझने का दावा एक ही कर सका।


मेरी समझ से गीता बहुत सरल ग्रंथ है अवश्य ही इसमें कुछ मौलिक प्रश्न आते हैं, जिन्हें हल करना बेशक मुश्किल है। लेकिन गीता की साधारण शिक्षा को न समझ सकना असम्भव है। इसे सभी सम्प्रदाय प्रामाणिक ग्रंथ मानते हैं। इसमें किसी प्रकार की साम्प्रदायिकता नहीं है। संक्षेप में यह सम्पूर्ण संयुक्त नीति-शास्त्र है। यों यह दर्शन-संबंधी और भक्ति-विषयक दोनों ही प्रकार का ग्रंथ है। इससे सभी लोग लाभ उठा सकते हैं। इसकी भाषा अत्यन्त सरल है।

फिर मैं समझता हूं हर प्रान्तीय भाषा में इसका एक प्रामाणिक अनुवाद होना चाहिए। वह अनुवाद ऐसा हो, जिससे गीता की शिक्षा सर्व-साधारण की समझ में आ सके। मेरी यह सलाह गीता के स्थान पर दूसरी पुस्तक रखने के बारे में नहीं है क्योंकि मैं अपनी यह राय दोहराता हूं कि हर हिन्दू बालक-बालिका को संस्कृत जानना चाहिए। पर अभी बहुत जमाने तक करोड़ों व्यक्ति संस्कृत से कोरे ही रहेंगे। केवल संस्कृत न जानने के कारण उन्हें गीता की शिक्षा से वंचित रखना आत्मघात करना होगा।


यंग इंडिया,हिन्दी नवजीवन 25-8-1927

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14 Jun, 2009

संगति का प्रभाव पड़ेगा फिर बिगड़े बिना कैसे रह सकते हैं?

टालस्टाय-आश्रम में मि. केलनबैक ने मेरे सामने एक प्रश्न प्रस्तुत किया। उनके उस प्रश्न के उठाने के पूर्व मैंने उस पर विचार नहीं किया था। आश्रम में कुछ लड़के बहुत उपद्रवी और दुष्ट थे। कई आवारा भी थे। लेकिन मि. केलनबैक का ध्यान तो इस समस्या की ओर था कि उक्त आवारा लड़कों के साथ मेरे लड़के कैसे रह सकते हैं? एक दिन उन्होंने कहा, आपकी यह नीति मुझे तनिक भी पसंद नहीं है। इन लड़कों के साथ आपके लड़कों के मिलने-जुलने का परिणाम तो एक ही हो सकता है इन आवारा लड़कों की संगति का प्रभाव उन पर (आपके लड़कों पर) पड़ेगा फिर वे बिगड़े बिना कैसे रह सकते हैं? मैं क्षण-भर सोच-विचार में पड़ा या नहीं, यह तो आज मुझे स्मरण नहीं है, लेकिन मैंने जो उत्तर दिया वह मुझे याद है। मैंने कहा था, अपने लड़कों और इन आवारा लड़कों के बीच मैं भेद कैसे कर सकता हूं। इस समय दोनों के लिए मैं एक-सा जिम्मेदार हूं। वे युवक मेरे बुलाने से आये हैं। यदि मैं उन्हें खर्च दे दूं तो वे आज ही जोहानिसबर्ग जाकर पूर्ववत् रहने लगेंगे। यहां आकर मुझ पर उन्होंने कृपा की है। यदि उनके माता-पिता भी यह स्वीकार करते हों तो इसमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं हो सकती। यहां आकर वे कुछ कष्ट ही उठा रहे हैं। इसका मुझे और आपको भी अनुभव है

ऐसी स्थिति में मेरा धर्म स्पष्ट है। मुझे उन्हें यहीं रखना चाहिए। अत: मेरे लड़कों को भी उन्हीं के साथ रहना है। इसके अतिरिक्त क्या मैं आज से ही अपने लड़कों को यह भेद-भाव सिखाऊं कि वे दूसरों से ऊंचे हैं। यह विचार उनके मस्तिष्क में डालना ही उन्हें गलत मार्ग पर ले जाना होगा। इस स्थिति में रहने से वे गढ़े जायेंगे और भले-बुरे की पहचान करना स्वयं सीखेंगे। हम यह क्यों न मानें कि उनमें यदि सचमुच गुण होगा तो उल्टे उन्हीं की छूत उनके साथियों को लगेगी। जो भी हो, मुझे तो उन्हें यहीं रखना है। यदि इसमें कोई जोखिम भी हो तो उसे सहन करना हमारा धर्म है।
प्रयोग का परिणाम बुरा हुआ, यह तो नहीं कह सकते। मैं यह स्वीकार नहीं करता कि उससे मेरे लड़कों को कोई हानि उठानी पड़ी हो। लाभ होता तो मैं अवश्य देख सका होता। यदि उनमें थोड़ी-बहुत बड़प्पन की भावना रही भी होगी तो वह बिलकुल लुप्त हो गई। उन्होंने सब के साथ मिल-जुल कर रहना सीख लिया। वे आग में तप गये।
इस और इसी प्रकार के अन्य अनुभवों से मुझे यह जान पड़ा है कि यदि माता-पिता की उचित देख-रेख हो तो भले-बुरे लड़कों के साथ रहने और पढ़ने-लिखने से अच्छे लड़कों की कुछ भी हानि नहीं होती।
ऐसा कोई नियम तो है ही नहीं कि अपने लड़कों को तिजोरी में बंद रखने से वे सदाचारी रहते हैं और उससे बाहर निकलने पर वे दुराचारी हो जाते हैं। हां, यह अवश्य है कि जहां अनेक प्रकार से लड़कों के साथ लड़कियां भी पढ़ती-लिखती और साथ रहती हों वहां माता-पिता और शिक्षक की कड़ी परीक्षा होती है और उन्हें सावधान रहना पड़ता है।
.....महात्मा गाँधी

आत्मकथा, खण्ड 4, अध्याय 35, नवजीवन, 15-1-1928 हिन्दी नवजीवन, 19-1-1928


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12 Jun, 2009

उसी तरह चिपका रहूंगा, जिस तरह अपनी मां की छाती से..


मेरी मातृभाषा में कितनी ही त्रुटियां क्यों हों, मैं उससे उसी तरह चिपका रहूंगा, जिस तरह अपनी मां की छाती से। वही मुझे जीवन देनेवाला दूध दे सकती है।
मैं उसकी जगह अंग्रेजी को भी प्यार करता हूं, लेकिन यदि वह उस स्थान को हड़पना चाहती है जिसकी वह हकदार नहीं है तो मैं उससे अत्यधिक घृणा करूंगा। यह बात मानी हुई है कि अंग्रेजी आज दुनियाभर की भाषा बन गई है। इसलिए मैं उसे दूसरी भाषा के तौर पर स्थान दूंगा। लेकिन विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में, स्कूलों में नहीं।
अंग्रेजी कुछ लोगों के सीखने की भाषा हो सकती है लाखों-करोड़ों की नहीं। आज जब हमारे पास प्रारंभिक शिक्षा को भी देश में अनिवार्य बनाने के साधन नहीं हैं, तब हम अंग्रेजी सिखाने के साधन कहां से जुटा सकते हैं।


रूस ने बिना अंग्रेजी के विज्ञान में इतनी उन्नति की है। आज अपनी मानसिक दासता के कारण ही हम यह मानने लगे हैं कि अंग्रेजी के बिना हमारा काम चल नहीं सकता। मैं यह बात नहीं मानता।
...महात्मा गाँधी


पूना के कौशिल हॉल में शिक्षामंत्रियों के सामने दिए गए भाषण का अंश,29-7-1946 हरिजन सेवक 25-8-1946( शिक्षण और संस्कृति, पृ. 441-2

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10 Jun, 2009

आश्रम में एक युवक बहुत शरारत करता था। वह झूठ बोलता था। किसी को गिनता नहीं था और दूसरों के साथ लड़ता-झगड़ता था। एक दिन उसने बहुत ही ऊधम मचाया। मैं घबराया। विद्यार्थियों को मैं कभी सजा नहीं देता था। इस बार मुझे बहुत क्रोध आया। मैं उसके पास गया। मैंने उसे समझाया-बुझाया, लेकिन वह किसी तरह नहीं समझा। उसने मुझे धोखा देने की भी कोशिश की। मैंने अपने पास खड़ी हुई रूल-पटरी उठायी और उसकी बाँह पर मार दी।

मारते
समय मैं कांप रहा था, यह उसने देख लिया होगा। ऐसा अनुभव किसी विद्यार्थी को मेरी ओर से कभी नहीं हुआ था। विद्यार्थी रो पड़ा। उसने मुझ से क्षमा मांगी। वह इसलिए नहीं रोया कि उसे लकड़ी लगने का दु: हुआ। यदि वह मेरा सामना करना चाहता तो उसमें मुझसे निपट लेने की शक्ति थी। उसकी अवस्था 17 वर्ष की रही होगी। उसके शरीर की गठन मजबूत थी। मगर मेरी रूल-पटरी में उसने मेरी पीड़ा का अनुभव किया। इस घटना के बाद उसने कभी मेरा सामना नहीं किया। मगर मुझे वह रूल-पटरी मारने का पछतावा आज तक है।


मुझे डर है कि मैंने उसे पीटकर अपनी आत्मा के बजाय अपनी पशुता के दर्शन उसे कराये थे। बच्चों को मार-मारकर पढ़ाने के खिलाफ मैं हमेशा रहा हूं। एक ही अवसर मुझे याद है, जब मैंने अपने लड़कों में से एक को मारा था। यह सजा देकर मैंने ठीक किया या नहीं, इसका निर्णय मैं आज तक नहीं कर सका। इस सजा के ठीक होने में मुझे शंका है, क्योंकि उसमें क्रोध भरा हुआ था और दण्ड देने का भाव था। यदि उसमें मात्रा अपना दु: ही प्रकट करना होता, तो मैं उस सजा को ठीक समझता। लेकिन उसके भीतर मिली-जुली भावना थी।


इस प्रसंग के बाद मैं विद्यार्थियों को सुधारने का अधिक अच्छा ढंग सीख गया। मैं नहीं कह सकता कि यदि इस कला का प्रयोग मैंने उस अवसर पर किया होता तो कैसा परिणाम निकलता। इस प्रसंग को वह युवक तो तुरन्त भूल गया।

मैं नहीं कह सकता कि उसमें बहुत सुधार हुआ होगा, लेकिन उस प्रसंग ने विद्यार्थी के प्रति शिक्षक के धर्म के विषय में मुझे अधिक सोचने की प्रेरणा दी। इसके बाद युवकों के ऐसे ही कसूर हुए, पर मैंने दण्ड-नीति हरगिज इस्तेमाल नहीं की। इस तरह आत्मिक ज्ञान देने की कोशिश में मैं अपनी आत्मा के गुणों को अधिक समझने लगा।
......महात्मा गांधी


महात्मा गांधी की आत्मकथा, भाग 4, अध्याय 34,
नवजीवन, 8-1-1928
हिन्दी नवजीवन, 12-1-1928

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8 Jun, 2009

स्कूलों में बच्चे पिटे तो डीएम को भी दंड : फ़िर वही घटिया तरीका ..मूलभूत समस्या से पलायन

स्कूलों में बच्चों की पिटाई या दूसरी शारीरिक सजा पर प्रिंसिपल या टीचर को जिम्मेदार बताकर जिलाधिकारियों के लिए पल्ला झाड़ना आसान नहीं होगा। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोगएनसीपीसीआर) ( की सख्ती का असर हुआ तो ऐसे मामलों को रोकने में विफल डीएम के भी खिलाफ कार्रवाई होगी। इतना ही नहीं, इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट के बाद आयोग राज्य सरकारों से भी जवाब तलब करेगा।

......इस ख़बर को आगे पढ़े



शिक्षक की अपने बच्चों के बारे में क्या मान्यतायें और विश्वास है , यह सिखाने के तरीकों तथा अपने छात्रों से अपेक्षाओं को बहुत ज्यादा प्रभावित करते हैं।बच्चों में जिज्ञासा पैदा कर हम उनका सीखना आसान कर सकते हैं। उनके अनुभव के आधार पर, रुचियों का ध्यान रखते हुए नवीन जानकारियों एवं अनुभवों को सहज रूप में जोड़ सकते हैं। उन्हें अभिव्यक्ति का पर्याप्त अवसर देकर उनकी कल्पनाशीलता एवं सृजनशीलता को सकारात्मक दिशा दे सकते हैं। तब हम पायेंगे कि हमारा काम आसान होता जा रहा है।


भारत
में, स्वातंत्र्योत्तर युग ने संवैधानिक उपलब्धियॉं, नीतियॉं, कार्यक्रम एवं विधान के माध्यम से बच्चों के प्रति सरकार के स्पष्ट रूख का अनुभव किया है। इस शताब्दी के अंतिम दशक में, स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा एवं संबंधित कार्यक्षेत्रों में आये तीव्र प्रोद्यौगिकी विकास ने बच्चों को नये अवसर प्रदान किये हैं।

भारत में बच्चों से संबंधित अनन्य समस्याओं पर प्राथमिकता से विचार करने के उद्देश्य से सरकारी, गैर-सरकारी संस्थाऍं (एनजीओ) एवं अन्य सभी एकजुट हो गये हैं। उनमें समाविष्ट संबंधित मुद्दे हैं- बच्चे और काम, बालश्रम की समस्या से निपटना, लिंग भेद उन्मूलन, फुटपाथ पर रहनेवाले बच्चों का उत्थान, विकलांग बच्चों की विशेष आवश्यकताओं को पूरा करना एवं हर बच्चे को उसके आधारभूत अधिकार के रूप में शिक्षा प्रदान करना।

बाल अधिकारों के विषय में ज्यादा जानकारी के लिए यंहा चटकाएं

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7 Jun, 2009

साहस या शक्ति न दे वह शिक्षा किस काम की... ?

.........शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए जो राष्ट्र के नौजवानों के विचारों में क्रान्ति कर दे।


परन्तु दुर्भाग्यवश शिक्षा की वर्तमान प्रणाली की रचना कुछ इस तरह की है कि उसका हमारी परिस्थिति के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है और उससे जो कुछ मिलता है वह भी राष्ट्र के बहुत थोड़ी संख्या के लड़के-लड़कियों को मिलता है। इसलिए इस शिक्षा का प्रभाव परिस्थिति पर कुछ भी पड़ता हो, ऐसा नहीं दिखता।

इस बुराई को यदि और किसी प्रकार कम किया जा सकता हो तो अवश्य कीजिए। मगर मुझे तो साफ दिखाई पड़ता है कि यह तथा अन्य बुराइयां ऐसी हैं जिनके बारे में सफलतापूर्वक कुछ भी कर सकने के लिए हमारी शिक्षा की पद्धति वर्तमान में देश की शीघ्रातिशीघ्र बदलती हुई परिस्थिति का सामना करने की शक्ति रखनेवाली होनी चाहिए।...जो हमारी नीति की भावना को धिक्कारने लायक लगता है उसका विरोध करने की भी जो शिक्षा विद्यार्थियों को साहस या शक्ति न दे वह शिक्षा किस काम की... ?

जो शिक्षा इतनी शक्ति सम्पन्न हो कि वह विद्यार्थियों की भीतरी शक्तियों का विकास कर जीवन के प्रत्येक क्षेत्रा में उठनेवाली समस्याओं का समाधान करे, वही शिक्षा अमूल्य है।
महात्मा गांधी


हरिजन बन्धु, 31-5-1936 शिक्षण और संस्कृति, पृष्ठ-138




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4 Jun, 2009

हम सभी के बीच दो क्रियाएं चलती हैं...

सिवाय चरित्र-गठन के धार्मिक और नैतिक शिक्षा का कुछ अर्थ नहीं है। इसलिए मैं लड़कों और लड़कियों से कहता हूं कि परमात्मा का कभी भरोसा छोड़ो और इसलिए अपना भी नहीं।



याद रखो कि यदि तुमने अपने मन में एक भी बुरे विचार को स्थान दिया तो तुममें विश्वास की कमी है। असत्य, अनुदारता, हिंसा, विषय-विकार यह सब बातें आत्मविश्वास होने पर ही उत्पन्न होती हैं। गीता में यही बात प्रत्येक श्लोक में कही गयी है। यदि मैं ईसा के गिरि शिखर पर के उपदेश का सारांश दूं तो वह भी यही है। कुरान में भी मैंने यही बात पायी है। हमारे अपने आप से अधिक हमारा और कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।


इसलिए यदि तुम बहादुर लड़के-लड़की हो तो इस प्रकार के सभी विचारों से जूझना तुम्हारा धर्म है। इस दुनिया में बुरे विचारों के उकसाये बिना कोई पापकर्म नहीं किया गया है। अपने दिल में उठने वाले प्रत्येक विचार की जाँच तुम्हें सावधानी से करनी है। कई विद्यार्थियों ने, लड़के और लड़कियों दोनों ने, मुझसे कहा है कि उनकी बुद्धि मेरी बातों को स्वीकारती तो है मगर अपने विचारों पर काबू रखना वे असंभव पाते हैं और इसीलिए वे अन्त में हार मानते हैं, निराश हो जाते हैं और तब कुछ गंदी पुस्तकों से उकसाये जाकर बुरे विचार रखने लगते हैं।

हम सभी के बीच दो क्रियाएं चलती हैं। उनका भेद मैं अच्छी तरह समझा देना चाहता हूं। सिद्धों और संतों के अतिरिक्त सबके मन में बुरे विचार उठेंगे ही। इसलिए ईश्वर से यह प्रार्थना करनी आवश्यक है कि हे परमात्मा! हमें बुरे विचारों से बचा। यह क्रिया हमारा लाभ ही करती है।


दूसरी क्रिया है - बुरे विचारों को सोचना और उन्हीं में मस्त रहना। यह अत्यन्त खतरनाक और हानिकारक क्रिया है और मैं तुमसे सारी शक्ति लगाकर इसी को मार भगाने को कहता हूं।


नवजीवन, 3-11-१९२९; शिक्षण और संस्कृति, पृष्ठ-58


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